श्री अवंति पाश्र्वनाथ
2300 साल पुराना श्री अवंति पाश्र्वनाथ
तेइसवें तीर्थकर भगवान श्री पाश्र्वनाथ स्वामी जी के अनेक नाम प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में मध्यप्रदेश में उज्जैन शहर में क्षिप्रा नदी के किनारे पर अवंति पाश्र्वनाथजी का भव्य चमत्कारिक जिनालय स्थित है जो अनेकानेक भव्य आत्माओं के लिए श्रद्धा का केंद्र है। अवंति पाश्र्वनाथजी की प्रतिमा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भगवान् महावीर स्वामीजी के लगभग 200 वर्ष बाद उनके ही पाट परंपरा के 8वें पट्टधर आचार्य सुहस्ति सूरिजी हुए। एकबार उनका पदार्पण उज्जयिनी में हुआ। यहां भद्रा सैठानी के घर में वे विराजे। भद्रा सेठानी का एक पुत्र था-अवंति सुकुमाल। बचपन शय्या से लेकर 32 पत्नियांे के होने तक वह युवा पुत्र अपने पुण्य को भोग रहा था। आचार्य सुहस्ति सूरिजी नीचे ठहरे हुए थे। रात्रि के समय अपने शिष्य परिवार के साथ वे आगमों का स्वाध्याय करते हुए नलिनीगुल्म विमान (देवलोक का एक विमान) के अध्ययन की पुनरावृत्ति कर रहे थे। उनकी आवाज ऊपर अवंति सुकुमाल के कमरे तक भी आ रही थी। उस युवान को यह लगने लगा कि जो वो गुरूदेव बोल रहे हैं, वैसा कहीं सुना है, कहीं देखा है, कहीं महसूस किया है,....अवंति सुकुमाल की चिंतनधारा इतनी प्रबंल होती गई कि उसे जाति स्मरण ज्ञान हो गया एवं उसे अपने पूर्वभव में नलिनीगुल्म विमान में देवरूप में बिताया गया जन्म याद आ गया। उस नलिनीगुल्म विमान में जन्म क्यों मिला... यह सोचते-सोचते उसे दीक्षा की भावना अभिव्यक्त की।
आचार्य भगवंत ने उसे समझाया कि तुम्हे बचपन से अब तक केवल सुखों का अनुभव है, मुनिजीवन की कठिनता का तुम पालननहीं कर सकोगे, किन्तु अवंति सुकुमाल दृढऋ रहा। आचार्य सुहस्ति को झूकना पड़ा। अवंति सुकुमाल की दीक्षा अगले ही दिन सम्पन्न हुई। दीक्षा के पहले ही दिन अवंति सुकुमाल ने गुरू से यावज्जीवन अनशन का व्रत ले लिया एवं श्मशान भूमि की ओर चल पड़े। पहली बार नंगे पैर चलना, कीड़े मकोड़ों का उपद्रव, भीषण ठंड आदि सभी चीजों का अनुभव अवंति सुकुमाल ने जीवन में प्रथम बार ही किया। रात्रि के पहले प्रहर में जीवों ने उनके पैर, दूसरे प्रहर में उनकी जंघा, तीसरे प्रहर में उनका पेट, चैथे प्रहर में उनके ऊपरी भाग के मांस को निगल लिया एवं मुनि अवंति सुकुमला दीक्षा की प्रथम रात्रि में ही कालधर्म को प्राप्त कर गए। अवंति सुकुमाल के कालधर्म से वैराग्य पथ को वरन करने के लिए उसकी एक गर्भवती पत्नी को छोड़ शेष सब परिवार ने भी दीक्षा ग्रहण की। गर्भवती स्त्री की कुक्षी से पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम महाकाल रखा गया एवं वीर सम्वत् 25 के आसपास उसने अपने पिता के संयम अनुमोदनार्थें पाश्र्वनाथ परमात्मा का भव्य जिन मंदिर उस स्थान पर बनवाया जो अवंति पाश्र्वनाथजी के नाम से विश्यात हुआ।
कालक्रम से मिथ्यात्वियों के बढ़ते प्रभाव से अन्य धर्मियों ने अवंति पाश्र्वनाथ की प्रतिमा ढककर उस स्थान पर शिवलिंग स्थापित कर दिया।
महावीर स्वामी जी के लगभग 900 वर्षाें बाद एक महाप्रभावक आचार्य हुए- आचार्य सिद्धसेन दिवाकर। उस समय उज्जैन- अवंति में राजा विक्रमादित्य का शासन था। राजा के समक्ष ही आचार्य देव ने शिवलिंग के आगे स्तोत्र बोलना चालू किया। उस स्तोत्र की 11वीं गाथा बोलते समय एवं भूमि कंपायमान हुई एवं निचे से पाश्र्वनाथ प्रभु की वही प्रतिमा प्रकट हुयी। सिद्धसेन दिवाकर जी ने 44 पद्यों में अपना स्तोत्र पूरा किया एवं वह आज कल्याण मंदिर स्तोत्र के नाम से सुविख्यात है। सत्य जानकर राजा भी आचार्य श्री का भक्त बना, अवंति पाश्र्वनाथ प्रतिमा जी की पुनस्र्थापना की गई। अवन्ति पाश्र्वनाथ जी की प्रतिमा अत्यंत प्रभावक कही जाती है।
दानीगेट पर 2300 साल पुराना अवंति पाश्र्वनाथ मंदिर देश का ऐसा पहला जैन मंदिर होगा, जहां कल्याण स्तोत्र की 44 गाथा देहरियों पर लिखी गई हो। यह मंदिर पहले से ही देश के 108 पाश्र्वनाथ मंदिरों में शामिल होने के कारण प्रसिद्ध है। 9 साल में 10 करोड़ रुपये के खर्च से अब जाकर इसका जीर्णाेद्धार पूरा हुआ है। आचार्य मणिप्रभ सागर महाराज इसके प्रणेता है। आचार्य के सान्निध्य में ही देशभर के जैन समाज के दानदाताओं के सहयो से 2008 में मंदिर निर्माण शुरू हुआ था। सफेद मार्बल से नए स्वरूप में बने मंदिर का निर्माण राजस्थान मकराना के 100 कारीगरों ने किया है। लगभग 100 फीट चैडे़, 200 फीट लंबे मंदिर की वर्ष 2018 में प्रतिष्ठा व शुभारंभ की तैयारियां चल रही है। 6 साल बाद आचार्यश्री स्वयं पैदल विहार करते हुए 30 मई को इसकी रूपरेखा बनाने उज्जैन आ रहे हैं। मंदिर जीर्णाेद्धार समिति के अध्यक्ष पुखराज चैपड़ा, ट्रस्ट अध्यक्ष हीराचंद्र छाजेड़ ने बताया आचार्य यहां एक दिन रूककर समाजजनों के साथ कार्यक्रम को लेकर चर्चा करेंगे तथा अगले दिन चातुर्मास हेतु राजस्थान के बीकानेर के लिए रवाना होंगे। आज भी ट्रस्ट के पास विक्रम संवत 266 से यह मंदिर उज्जैन में स्थित होने का रिकार्ड उपलब्ध है।
जानें क्या है कल्याण स्तोत्र की 44 गाथा, इसलिए उज्जैन मंे लिखी:-
जैन समाज मंे नवकार महामंत्र की तरह कल्याण स्तोत्र का बड़ा महत्व है। इसको ध्यान में रखकर अवंति पाश्र्वनाथ में कल्याण स्तोत्र मंदिर बनवाकर इसकी 44 गाथाओं को 44 देहरियों पर लिखा है। समाजजन दर्शन कर इसे पढ़ भी सकेंगे। मंदिर के ट्रस्टी चंद्रशेखर डागा, निर्मल सखलेचा के अनुसार उज्जैन में इसी मंदिर में ऐसा इसलिए किया क्योंकि आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने इस स्थान पर कल्याण स्तोत्र की रचना की थी और 11वीं गाथा की रचना के समय स्वयं भगवान पाश्र्वनाथ की प्रतिमा प्रगट हुई। यही कारण है जीर्णाेद्धार के लिए प्रतिमा को मूल स्थान से आज तक नहीं हटाया और पूरा मंदिर बन गया। जहां कल्याण स्तोत्र की 44 गाथा देहरियों पर लिखी गई।
